ब्लॉग - नीरज बाली

ब्रह्मांडीय चेतना, मानव और धर्म

नीरज बाली द्वारा Apr.12, 2009 को, "धर्म एंव दर्शन" श्रेणी के अंतर्गत

ब्रह्मांडीय चेतना प्रत्येक मानव की उद्धारकर्ता है और मानव मस्तिष्क का विकास इसी लौकिक चेतना का ही एक उत्पाद है. ब्रह्मांडीय चेतना के अनुभव की वास्तविक प्रकृति के बारे में तभी जाना जा सकता हैं जब हम एक खुले मस्तिष्क और विनम्रता की भावना के साथ अपनी मानसिक स्थिति का अवलोकन करने का प्रयास करें. प्रत्येक धर्म हमें यही सिखाने का प्रयास करता है.

मेरे विचार और निष्कर्ष अगर सही हैं तो इस समय समाज में स्वंय को समझने से महत्वपूर्ण कोई और विषय नहीं हो सकता जबकि आज का मानव दूसरों को समझने और मारने में ही मगन है. ये कैसी दौड़ है जहाँ जीतने वाला गंतव्य तक अकेला ही पहुंचना चाहता है? मानव मस्तिष्क अभी भी जैविक विकास की स्थिति में है और इस विकास की गति इतनी तेज है कि इसके तूफान ने पूरी सामाजिक और राजनीतिक संरचना को ही तहस-नहस कर दिया है. आज मानव अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिये समाज को विभाजित करता जा रहा है, मुझे तो वह दिन स्मरण करके भय आता है जब समाज में हर व्यक्ति का अपना अलग से धर्म होगा, तब हम जानवरों की तरह अपनी घास खाने में ही व्यस्त रहेंगे और जब ‘शेर’ आयगा तो हम केवल अपनी ही जान बचाने के लिये भागेंगे ना कि एकता के साथ उस का सामना करेंगे.

आज हमें आवश्यकता है अपने-अपने धर्मों को समझते हुए मस्तिष्क के विकास को सकारात्मक पथ पर लाने की, ना कि उस के अधीन हो जाने की. परमात्मा ने मस्तिष्क को जीव-आत्मा के अधीन किया है ना कि जीव-आत्मा को इस स्थूल मस्तिष्क के. दुनिया की स्थिति में निरंतर तनाव और दबाव, एक सामान्य बुद्धि में असंतोष और शांति की कमी, निकट आपदा के कथित पूर्वाभास, औषधियों (ड्रग्स) के व्यापक उपयोग, युवाओं की बगावत, वैवाहिक जीवन की त्रासदियां, राजनीतिक असत्यता और धार्मिक वास्तविकता से दूरी, धर्म से दूर हुए मस्तिष्क के ठोस प्रमाण हैं. मेरे दृष्टिकोण से, धार्मिक अनुभव को हल्के ढंग नहीं लिया जाना चाहिए और धर्म को एक राजनीतिक विषय के रूप में तो कतई भी नहीं लिया जाना चाहिए. धर्म बुद्धि के प्रान्त से परे एक पवित्र विषय है. प्राचीन भारत में सदियों तक विशाल वेदों को स्मृतिबद्ध किया जाता था और मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेषित किया जाता था जो कि एक विलक्षण उपलब्धि थी क्योंकि वहाँ एक अवचेतन जागरूकता थी और मानव जाति के लिए क्या निहित है, इस का अत्यंत महत्व था.

यह स्पष्ट है कि पृथ्वी का मानसिक वातावरण आज वैसा नहीं है जिस रूप में हजारों वर्ष पहले था. लेकिन हमें पता नहीं है कि इस तेजी से बदलाव के पीछे रहस्यमय प्राकृतिक कारक क्या हैं. समस्त पृथ्वी पर बढ़ती पीढ़ियों व पुरानी पीढ़ियों के बीच का अंतर इतना बड़ा और मुश्किल क्यों हो गया है? ये एक अलग विषय है, परन्तु मैं आप को कम शब्दों में समझाने का प्रयास करता हूँ. आप पृथ्वी के वातावरण के बारे में तो जानते ही होंगे, जिस में हम श्वास लेते हैं, परन्तु क्या आपको ज्ञान है कि पृथ्वी का एक मानसिक वातावरण भी होता है, जोकि उस ब्रह्मांडीय चेतना का ही एक अंग है, जिस में हम सोचते हैं? हमारी पृथ्वी एक लोह-चुंबक है इस बात से तो सब सहमत होंगे, आप कृपया ये भी समझ लें कि पृथ्वी की एक अनन्य-आवृत्ति (unique-frequency) भी है और अगर आवृत्ति है तो उसका एक माप भी होगा, जोकि वर्तमान युग में 7Hz आस-पास है. ये भी वैज्ञानिक सत्य है कि मानव मस्तिष्क की भी आवृत्ति होती है. वर्तमान में बहुत से यन्त्र हैं जो मानव मस्तिष्क की आवृत्ति को पढ़ और अंकित कर सकते हैं. मानव मस्तिष्क मे स्थापित न्यूरॉन एक संवेदक (रिसेप्टर) की तरह कार्य करते हैं जोकि सदैव सन्घटित व विघटित होते रह्ते हैं. जिस प्रकार उपग्रह से प्रेषित आवृत्ति संकेतों को हमारे रेडियो या टेलीविज़न ग्रहण कर सकते हैं ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क भी ब्रह्मांडीय आवृत्तियों के प्रति संवेदनशील होता है तथा उन्हें ग्रहण कर सकता है. हमारा मस्तिष्क रेडियो या टेलीविज़न की तुलना में बहुत ही अधिक उन्नत है क्योंकि ये मात्र आवृत्तियों को ग्रहण ही नहीं करता बल्कि स्वयं द्वारा निर्मित आवृत्तियों को ब्रह्मांड में प्रेषित भी करता है. मानव मस्तिष्क भिन्न-भिन्न आवृत्तियों पर कार्य करता है जोकि हमारी भावनात्मक मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है. दैनिक कार्य के समय मस्तिष्क की आवृत्ति 20Hz से 40Hz के बीच होती है और निद्रा के समय 7Hz से 10Hz बीच . मस्तिष्क की आवृत्ति जितनी अधिक होगी हम उतना ही तनाव अनुभव करेंगे और जितनी कम होगी हम उतना ही आनंद व हर्ष अनुभव करेंगे. योग और ध्यान इसी विज्ञान पर आधारित हैं जिस का अनवेषण हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले ही कर लिया था. योग और ध्यान का मूल सिधान्त मानव मस्तिष्क की आवृत्ति को पृथ्वी की प्राकृतिक आवृत्ति के साथ संयोजित करना ही है. उपरोक्त विषय को अगर आप जान पाए हैं तो आप समझ रहे होंगे कि पृथ्वी का मानसिक वातावरण क्या है. जी हाँ, मेरा आशय पृथ्वी या ब्रह्मांड की उस अनन्य-आवृत्ति से है जिस के कारण ही मानव मस्तिष्क में विचार जन्म लेते हैं और विचार से ही इस स्थूल जगत में आकार जन्म लेते हैं. पृथ्वी पर युगों के बदलने से तात्प्रय पृथ्वी की बदलती हुई आवृत्तियों से है और अगर आवृत्तियां बदलेंगी तो पृथ्वी पर सब कुछ बदलेंगा और् मानव इस का अपवाद नहीं हो सकता.

धर्म का सम्बन्ध मनुष्य के अवचेतन से है और कर्म का सम्बन्ध मनुष्य के चेतन से. हमारा अवचेतन सदैव ब्रह्मांडीय चेतना में आसक्त रहता है तभी तो वह चेतन मस्तिष्क के आदेश के बिना ही हमारे हृदय, श्वास, रक्त परिसंचरण व समस्त अंगों के को संचालन में सदैव कार्यरत रहता है. हमारा चेतन मन एक गणना का उपकरण है और तर्क-वितर्क इसका एक तात्विक गुण है यही गुण साधारण मानव को परम तत्व से परे करता है. विशाल वेदों में ऋषियों ने इसी तत्व से मानव का परिचय करवाया है. मनुष्य का वह वर्ग जिस में मौजूदा धर्मों के संस्थापक, रहस्यवादी, भविष्यद्वक्ता सम्मिलित हैं, ने मानवता के व्यवहार पर सबसे बड़ा प्रभाव डाला है. राजाओं, दार्शनिकों, शासकों, वैज्ञानिकों या विद्वानों, सभी ने संयुक्त रूप से एक द्वितीयक भूमिका निभाई है. प्रगट धार्मिक शिक्षण ने एक आकर्षण का आयोजन किया है और मानव मन में एक पकड़ बनाए रखी है जो कि जीवन के किसी भी अन्य क्षेत्र से अतुल्य है. हजारों सालों से ये पकड़ जारी है, क्यों?  क्या है जो लाखों करोड़ों प्राणियों को अपने धर्म संस्थापकों के शब्दों पर आज के इस तर्कसंगत युग में भी विश्वास है? हालांकि शाब्दिक प्रौद्योगिकी के चमत्कारों की बाढ़ में क्यों आज भी जनता को उनके धर्म के आदर्शों में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के तर्कसंगत प्रतिपादन की तुलना में अधिक विश्वास है? क्यों प्रतिष्ठित वैज्ञानिक भी अपने अंत काल में धर्म की ही शरण में जाते हैं? इस विरोधाभास की व्याख्या क्या है? ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां वह तर्कवादी जो युवा काल् में धर्म के प्रति अविश्वासी रहे, अपने जीवन के अन्त काल में धार्मिक दिशा में बदल गये. यहाँ तक कि भौतिकवादी राजनीतिक विचारधाराएं भी जनता के इन विश्वासों को उखाड़ करने में सक्षम नहीं हुईं. इस का मूल कारण यही है कि मनुष्य का चेतन मन तो उस ब्रह्मांडीय चेतना, जिसे ईश्वर, भगवान व चाहे कुछ भी कहें, को नकार सकता है परन्तु उस का अवचेतन मन इस सत्य को कभी नकार नहीं सकता जैसे नदी का जल कभी नकार नहीं सकता कि वह पृथ्वी पर बहता है परन्तु मूर्ख मछली इसे ना माने, पूर्ण संभव है.

मेरे इस लेख का मुख्य उदेश्य आप को उस ब्रह्मांडीय चेतना से अवगत करवाना है जो प्रत्येक क्षण हमारे चारों ओर प्रवाहित रहती है, जो जीव के माध्यम से हमें परिवर्तनशील रहने के लिए बताती है और सभी धर्म सिर्फ उसी को जानने का भिन्न-भिन्न पथ हैं जो उसी ब्रह्मांडीय चेतना पर समाप्त होते हैं क्योंकि वहाँ से आगे कुछ नहीं सिवाय अन्नत के.

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2 comments to “ब्रह्मांडीय चेतना, मानव और धर्म”

  1. Anil K Garg

    Its great feeling to know that somebody from our circle has grown-up in real term its not only age but thought and perception as well….ur thoughts and views in the abovetopics are very good ..keep it up…
    But you must accept a truth that there are n number of institutions and thoughts as per religion is concerned ,one is free to express and counter on any subject and school of thought.

    Practically religion is nothing but a faith,,,,and a path to complete journey of life…

    Regds.
    Anil

  2. नीरज बाली

    धन्यावाद अनिल,
    मैं आप की बात से सहमत हूँ कि धर्म एक आस्था है, एक रास्ता है जीवन की यात्रा पूरी करने के लिए और यह यात्रा उसी अनंत में समाप्त होती है जो मानव जीवन काल में सदैव हमारे चारों ओर विराजमान है और जिसे साधारणतया हम जीवित अवस्था में भूल जाते हैं. मैंने इस लेख में यही बताने की चेष्टा की है कि अगर हम जीवित रहते हुए ही उस ब्रह्मांडीय चेतना में विलय होना सीख लें तो जीने में बात ही कुछ और होगी.

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