ब्लॉग - नीरज बाली

देश समाज एंव राजनीति

भारत और इतिहास

नीरज बाली द्वारा Apr.28, 2010 को, देश समाज एंव राजनीति श्रेणी के अंतर्गत

भारत का इतिहास आम तौर पर ब्रिटिश लोगों द्वारा औपनिवेशिक काल में उनके द्वारा की गयी पुरातात्वि और भाषाई खोजों के आधार पर लिखा गया है या हम कह सकते हैं कि अंग्रेजों द्वारा नियोजित इतिहासकारों द्वारा लिखा गया है, जैसे कि ‘मैक्स मुलर’. लेकिन ब्रिटिश, जो उस समय भारत के स्वामी थे, उन्होने अपने निहित स्वार्थ और ये दिखाने के लिए कि भारतीय सभ्यता उतनी महान नहीं है जितना कि 18वीं शताब्दी तक माना जाता था, 18वीं शताब्दी तक यूरोप के दार्शनिक और बुधिजीवी, जैसे कि वॉलटैर,
हेगेल, और उस से भी पहले नीत्शे, भारतीय दर्शन और विज्ञान को बाकी सभी दर्शनों और विज्ञानों का जनक बताया करते थे. अंग्रेज भारतीयों को, विशेषतः वैदिक संस्कृति के अनुयायियो को नियंत्रित और हीन बनाने की भावना से इस ग्रस्त थे, इसलिए अंग्रेजों ने ही व्यापक रूप से प्रचारित किया कि वेद केवल मिथ्या हैं क्योंकि वेदों और पुराणों में ही उस समय तक के भारत का इतिहास सम्मिलित था.

यही मुख्य कारण था कि अंग्रेजों ने दो सूत्री रणनीति की स्थापना की;
पहला, भारतीय इतिहास की तिथियों को बदल कर नया बनाया गया; जैसे कि उदाहरण के लिये वेदों की रचना का समय, जोकि बहुत अधिक प्राचीन तिथि से 1200 BC तक ऊपर ले कर आया गया. और दूसरा, ये दिखाने के लिये कि भारत में जो कुछ भी अच्छा था - संस्कृत, दर्शन, स्थापत्य कला, साहित्य - सब पश्चिम से आर्य आक्रमणकारियों द्वारा लाया गया. इस उदेश्य के लिये, ज्ञात या अज्ञात रूप में, बहुत सी तथाकथित खोजें की गयीं, जैसे कि ‘मोरटीमर व्हीलर’ द्वारा मोहन-जोदडो में मनाव कंकालों का पाया जाना, जिसने कि उसे उतावलेपन में ये निष्कर्ष निकालने को प्रेरित किया कि आर्य आक्रमणकारियों नें द्रविड़ लोगों का संहार किया. अंग्रेजों ने ही ये प्रचार किया कि वैदिक आर्यों ने 1500 और 1200 ईसा पूर्व के बीच भारत में प्रवेश किया और अपनी श्रेष्ठता, घोड़े और लोहे के हथियारों के बल पर देशी द्रविड़ संस्कृति पर विजय प्राप्त की और ये कि वैदिक संस्कृति और साहित्य आयातित हैं. आर्य आक्रमण सिद्धांत, तथापि, अपनी वैदिक विरासत से भारत के निवासियों वंचित करने, और ये दिखाने के लिए कि उनकी संस्कृति का धन विदेशी धरती से आया, का षढयंत्र था.

खेदजनक है कि इसी रूप में भारतीय इतिहास में इन मिथकों की स्थापना हुई जो कि आज भी उसी तरह टीकी हुई है. दुर्भाग्यवश, हमारे ‘महान’ विधिकारों ने जिस तरह अंग्रेजों के संविधान का सशब्द अनुकरण किया, वैसे ही इतिहासकारो ने आँखों पर पट्टी बांध कर अंग्रेजों द्वारा रचित इतिहास को अपना लिया और भारत के स्कूलों में आज भी उसी को पढ़ाया जा रहा है.

भाग्यवश आज बहुत सी नई पुरातात्विक खोजों ने भारतीय इतिहास में टांकी गयी उन मिथकों को बिखेर कर रख दिया है जिन पर कि ये गलत इतिहास आधारित है. आज उपग्रह फोटोग्राफी द्वारा सरस्वती नदी के विस्तार का जो भूवैज्ञानिक मानचित्रण किया गया है वह ये दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता सिन्धुं घाटी की संस्कृति से बहुत पहले से अस्तित्व में थी. इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि भारतीय इतिहास के संकेतक वर्तमान इतिहास में दिये गये समय से कहीं अधिक पहले के हैं. प्राचीन वैदिक साहित्य में एक विशाल संख्या में प्रस्तुत सामग्री और विवरण को आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षों के समक्ष दिखाया जा सकता है. वेदों को एक उच्च विकसित वैज्ञानिक साहित्य के रूप में माना जा सकता है, ये ज्ञान की एक महान सांस्कृतिक संपत्ति संजोये हुये हैं जोकि आधुनिक विश्व में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि आज से सहस्त्रों वर्ष पहले थी.

तथ्य जो आर्यन आक्रमण सिद्धांत पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं:

  • भारत के बाहर आर्य मातृभूमि का वेदों में कहीं भी उल्लेख नहीं है और ना ही कहीं और ऐसा प्रमाण मिलता है. इस के प्रत्युत, वेदों में शक्तिशाली सरस्वती नदी और अन्य स्थानों का उल्लेख किया गया है. आज की तिथि तक, आर्यों की घुसपैठ के लिए, न तो पुरातात्विक, भाषाई, सांस्कृतिक और न ही आनुवंशिक प्रमाण पाया गया है.
  • वेदों मे 2500 से अधिक पुरातत्व स्थलों का उल्लेख मिलता है, जिन में से दो तिहाई हाल ही में खोजी गयी सूखी सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित हैं.
  • सूखी सरस्वती नदी के विस्तार के बारे में किए गए सभी स्वतंत्र अध्ययन एक ही समय अवधि 1900 B.C.E. (ईसा पूर्व) की ओर संकेत करते हैं.
  • अंग्रेजों द्वारा वैदिक साहित्य की कल्पनिक तिथियां, आर्य आक्रमण के लिए 1500 B.C.E. और ऋग्वेद के लिए 1200 B.C.E., दोनों को अब वैज्ञानिक प्रमाण असत्य प्रमाणित करते हैं.
  • मैक्स मुलर, आर्यन आक्रमण सिद्धांत के प्रमुख वास्तुकार, ने भी अपनी मृत्यु से पहले माना कि उसकी वैदिक कालक्रम की तिथियां काल्पनिक थीं. अपनी मृत्यु के पहले प्रकाशित पुस्तक ‘The Six Systems of Indian Philosophy’ में उस ने लिखा है कि “Whatever may be the date of the Vedic hymns, whether 15 hundred or 15,000 B.C.E., they have their own unique place and stand by themselves in the literature of the world.”
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