मेरी कविता
हम भारतीय
नीरज बाली द्वारा Jul.02, 2009 को, मेरी कविता श्रेणी के अंतर्गत
हम भारतीय!
स्वयं कुछ नहीं करते
दूसरों को पुकारते रहते हैं
हम! गिरते हैं, उठते नहीं
परन्तु और पसारते रहते हैं
सब ढोंग है, प्रवृति का
आलस्य में उलझी आत्मा
विवश है, अकर्मठता पर
स्वार्थ के तोतले शब्द
स्व-स्थापित हो चुके हैं
मानव जिव्हा पर
मूल भाषा बन कर
तभी तो!
हम कभी कहते नहीं
फुंकारते रहते हैं!!
दरिद्र है प्रत्येक जन
जो अज्ञ है आत्मबल का
जो साधक व वादक है
भूत की वीणा का
हम में से कोई भी
रचयिता नहीं
नवीन राग का
क्योंकि हम, रचते नहीं
बस अलापते रहते हैं
मन मगन हैं
अवशेष मधुरता के
कर्कश कूक में कोयल
रूदन करती है
सूखे हुए अम्बुआ से
गहनों से जगमगाती ‘नववधू’
चिन्तित है
पिता की चिता की लकड़ी हेतू
ध्वस्त हो चुके हैं सम्बन्धों के सेतू
शेष बचे हैं
कुछ पथरीले बुलबुले
जो फूट रहे हैं बारी-बारी
हम हो चुके हैं
पूर्ण शिकारी
क्यों?
इसलिए कि हम
सृजनते नहीं
मारते रहते हैं
निवारण्!!
असमर्थ सा जमा पड़ा है
कुछ दूर ठण्ड में
कारण यही कि हम
जलते नहीं मशाल सा
बस अंगारते रहते हैं
और
हम नग्न हैं, पहनते नही
उतारते रहते हैं…

