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भारत और इतिहास

नीरज बाली द्वारा Apr.28, 2010 को, देश समाज एंव राजनीति श्रेणी के अंतर्गत

भारत का इतिहास आम तौर पर ब्रिटिश लोगों द्वारा औपनिवेशिक काल में उनके द्वारा की गयी पुरातात्वि और भाषाई खोजों के आधार पर लिखा गया है या हम कह सकते हैं कि अंग्रेजों द्वारा नियोजित इतिहासकारों द्वारा लिखा गया है, जैसे कि ‘मैक्स मुलर’. लेकिन ब्रिटिश, जो उस समय भारत के स्वामी थे, उन्होने अपने निहित स्वार्थ और ये दिखाने के लिए कि भारतीय सभ्यता उतनी महान नहीं है जितना कि 18वीं शताब्दी तक माना जाता था, 18वीं शताब्दी तक यूरोप के दार्शनिक और बुधिजीवी, जैसे कि वॉलटैर,
हेगेल, और उस से भी पहले नीत्शे, भारतीय दर्शन और विज्ञान को बाकी सभी दर्शनों और विज्ञानों का जनक बताया करते थे. अंग्रेज भारतीयों को, विशेषतः वैदिक संस्कृति के अनुयायियो को नियंत्रित और हीन बनाने की भावना से इस ग्रस्त थे, इसलिए अंग्रेजों ने ही व्यापक रूप से प्रचारित किया कि वेद केवल मिथ्या हैं क्योंकि वेदों और पुराणों में ही उस समय तक के भारत का इतिहास सम्मिलित था.

यही मुख्य कारण था कि अंग्रेजों ने दो सूत्री रणनीति की स्थापना की;
पहला, भारतीय इतिहास की तिथियों को बदल कर नया बनाया गया; जैसे कि उदाहरण के लिये वेदों की रचना का समय, जोकि बहुत अधिक प्राचीन तिथि से 1200 BC तक ऊपर ले कर आया गया. और दूसरा, ये दिखाने के लिये कि भारत में जो कुछ भी अच्छा था - संस्कृत, दर्शन, स्थापत्य कला, साहित्य - सब पश्चिम से आर्य आक्रमणकारियों द्वारा लाया गया. इस उदेश्य के लिये, ज्ञात या अज्ञात रूप में, बहुत सी तथाकथित खोजें की गयीं, जैसे कि ‘मोरटीमर व्हीलर’ द्वारा मोहन-जोदडो में मनाव कंकालों का पाया जाना, जिसने कि उसे उतावलेपन में ये निष्कर्ष निकालने को प्रेरित किया कि आर्य आक्रमणकारियों नें द्रविड़ लोगों का संहार किया. अंग्रेजों ने ही ये प्रचार किया कि वैदिक आर्यों ने 1500 और 1200 ईसा पूर्व के बीच भारत में प्रवेश किया और अपनी श्रेष्ठता, घोड़े और लोहे के हथियारों के बल पर देशी द्रविड़ संस्कृति पर विजय प्राप्त की और ये कि वैदिक संस्कृति और साहित्य आयातित हैं. आर्य आक्रमण सिद्धांत, तथापि, अपनी वैदिक विरासत से भारत के निवासियों वंचित करने, और ये दिखाने के लिए कि उनकी संस्कृति का धन विदेशी धरती से आया, का षढयंत्र था.

खेदजनक है कि इसी रूप में भारतीय इतिहास में इन मिथकों की स्थापना हुई जो कि आज भी उसी तरह टीकी हुई है. दुर्भाग्यवश, हमारे ‘महान’ विधिकारों ने जिस तरह अंग्रेजों के संविधान का सशब्द अनुकरण किया, वैसे ही इतिहासकारो ने आँखों पर पट्टी बांध कर अंग्रेजों द्वारा रचित इतिहास को अपना लिया और भारत के स्कूलों में आज भी उसी को पढ़ाया जा रहा है.

भाग्यवश आज बहुत सी नई पुरातात्विक खोजों ने भारतीय इतिहास में टांकी गयी उन मिथकों को बिखेर कर रख दिया है जिन पर कि ये गलत इतिहास आधारित है. आज उपग्रह फोटोग्राफी द्वारा सरस्वती नदी के विस्तार का जो भूवैज्ञानिक मानचित्रण किया गया है वह ये दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता सिन्धुं घाटी की संस्कृति से बहुत पहले से अस्तित्व में थी. इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि भारतीय इतिहास के संकेतक वर्तमान इतिहास में दिये गये समय से कहीं अधिक पहले के हैं. प्राचीन वैदिक साहित्य में एक विशाल संख्या में प्रस्तुत सामग्री और विवरण को आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षों के समक्ष दिखाया जा सकता है. वेदों को एक उच्च विकसित वैज्ञानिक साहित्य के रूप में माना जा सकता है, ये ज्ञान की एक महान सांस्कृतिक संपत्ति संजोये हुये हैं जोकि आधुनिक विश्व में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि आज से सहस्त्रों वर्ष पहले थी.

तथ्य जो आर्यन आक्रमण सिद्धांत पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं:

  • भारत के बाहर आर्य मातृभूमि का वेदों में कहीं भी उल्लेख नहीं है और ना ही कहीं और ऐसा प्रमाण मिलता है. इस के प्रत्युत, वेदों में शक्तिशाली सरस्वती नदी और अन्य स्थानों का उल्लेख किया गया है. आज की तिथि तक, आर्यों की घुसपैठ के लिए, न तो पुरातात्विक, भाषाई, सांस्कृतिक और न ही आनुवंशिक प्रमाण पाया गया है.
  • वेदों मे 2500 से अधिक पुरातत्व स्थलों का उल्लेख मिलता है, जिन में से दो तिहाई हाल ही में खोजी गयी सूखी सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित हैं.
  • सूखी सरस्वती नदी के विस्तार के बारे में किए गए सभी स्वतंत्र अध्ययन एक ही समय अवधि 1900 B.C.E. (ईसा पूर्व) की ओर संकेत करते हैं.
  • अंग्रेजों द्वारा वैदिक साहित्य की कल्पनिक तिथियां, आर्य आक्रमण के लिए 1500 B.C.E. और ऋग्वेद के लिए 1200 B.C.E., दोनों को अब वैज्ञानिक प्रमाण असत्य प्रमाणित करते हैं.
  • मैक्स मुलर, आर्यन आक्रमण सिद्धांत के प्रमुख वास्तुकार, ने भी अपनी मृत्यु से पहले माना कि उसकी वैदिक कालक्रम की तिथियां काल्पनिक थीं. अपनी मृत्यु के पहले प्रकाशित पुस्तक ‘The Six Systems of Indian Philosophy’ में उस ने लिखा है कि “Whatever may be the date of the Vedic hymns, whether 15 hundred or 15,000 B.C.E., they have their own unique place and stand by themselves in the literature of the world.”
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आधारभूत वेब अवधारणाएं- भाग 1 (Basic web concepts - part 1)

नीरज बाली द्वारा Jan.10, 2010 को, वेब रचना (Web Designing) श्रेणी के अंतर्गत

डोमेन-नाम, वेब सर्वरों के लिए एक परिचय, और वेबसाइट होस्टिंग

इस अनुच्छेद में मैं आप को बहुत संक्षिप्त में कुछ उपयोगी बातें बताने जा रहा हूँ, ये सब उन छात्रों के लिये है जो इस विषय में नये हैं. मैं बहुत विस्तार में नहीं जाऊँगा ताकि आप भ्रमित ना हों और आप को पर्याप्त बुनियादी समझ प्राप्त हो.

वेब क्या है?

संक्षेप में, वेब परस्पर कंप्यूटरों का एक पूरा गुच्छा है जो एक दूसरे से बात करते रहते हैं. ये कंप्यूटर (वेब पर) आमतौर पर फोन लाइन, डिजिटल उपग्रह संकेतों, केबल, और डेटा (सूचना) के अन्य प्रकार के हस्तांतरण-तंत्र से जुड़े हुए हैं. एक ‘डाटा-हस्तांतरण’ तंत्र द्वारा ही सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है. वह सभी कंप्यूटर, जो परस्पर मिल कर एक वेब का निर्माण करते हैं, हर समय (24/7) आपस में जुड़े रहते हैं या उन को समय-समय पर जोड़ा जा सकता है. वे कंप्यूटर जो हमेशा एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं, सर्वर (सूचना परोसनेवाले) कहलाते हैं. सर्वर मात्र एक कंप्यूटर ही होता है लेकिन साधारण कंप्यूटर और सर्वर में प्रमुख अंतर ये है कि सर्वर में कुछ विशेष सॉफ़्टवेयर स्थापित किये गये होते हैं जिनको ‘सर्वर सॉफ्टवेयर’ कहते हैं.

सर्वर सॉफ्टवेयर का काम क्या है?

सर्वर सॉफ्टवेयर वेब पेज और वेब साइटों को दिखाने का काम करते हैं. मूल रूप से, सर्वर कंप्यूटर वेब साइटों से भरे होते हैं और बस लोगों द्वारा वेब पेज दिखाने का अनुरोध (वेब ब्राउज़र के जरिए) आने के लिए प्रतीक्षा करते हैं. जब ब्राउज़र (इंटरनेट देखने की खिड़की) किसी पृष्ठ को दिखाने का अनुरोध भेजता है तो सर्वर इसे बाहर दिखाये जाने के लिए भेजता है.

वेब सर्फर (वेब साइट देखने वाला ) एक वेब साइट की खोज कैसे करता है?

इस का संक्षिप्त उत्तर है, URL को टाइप करके, या दूसरे शब्दों में, वेब साइट के पते को टाइप करके. उदाहरण के लिए, यदि आप www.neerajbali.com वेब साइट की खोज करना चाहते हैं तो आप वेब ब्राउज़र के ’एड्रेस-बार’ (पता-पट्टी) में इस पते को टाइप करके ‘की-बोर्ड’ पर ‘एनटर बटन’ दबाएंगे.

दूसरे तरीकों से भी वेब साइटों को खोजा जा सकता है जैसे कि खोज-इंजन (सर्च-इंजन), परन्तु परदे के पीछे, वेब साइटों को उनके पते के द्वारा ही खोजा जाता है. अब हमारे सामने सवाल आता है कि एक वेबसाइट के लिए एक आधिकारिक पता (डोमेन नाम) कैसे प्राप्त किया जाता है ताकि बाकी लोग वहाँ पहुंच सकें? सो आगे पढ़ें…

डोमेन नाम क्या है?

डोमेन नाम वेब साइट का पहचान लेबल होता है, जैसे हम सभी का कोई नाम होता है. डोमेन नाम वैसे तो अक्षर और संख्याओं द्वारा निर्मित होता है लेकिन असल में ये छिपी हुई संख्याओं से बनता है जिन्हें आईपी संख्याएं भी कहा जाता है. एक नाम का केवल एक ही डोमेन हो सकता है.

डोमेन नाम को दर्ज करना

जी हां, अगर आप डोमेन-नेम दर्ज करवाना चाहते हैं तो उस के लिए एक वार्षिक शुल्क देनी होगी. एक एक डोमेन नाम को दर्ज करवाने से हमें अपनी वेब साइट के लिए वर्ल्ड वाइड वेब (इंटरनेट) पर एक आधिकारिक पता प्राप्त हो जाता है. इस आधिकारिक पते की सहायता से ही सारी दुनिया के लोग हमारी वेब साइट पर पहुंच पाते हैं, आप के घर के पते की तरह. इंटरनेट पर कोई प्रतिरूप पते (डुप्लीकेट डोमेन ) नहीं हो सकते अन्यथा वेब ब्राउज़र को पता नहीं चलेगा कि कहाँ जाना है. दूसरे शब्दों में, डोमेन-नेम वेब पर अनन्य (यूनीक) पते होते हैं.

एक डोमेन-नेम को दर्ज करने में पैसे क्यों लगते है?

डोमेन नाम दर्ज करने की लागत कम से कम 10 अमरीकी डालर से लेकर लगभग 30 डॉलर प्रति वर्ष के बीच होती है. आप 1 से 10 साल के लिए एक डोमेन रजिस्टर कर सकते हैं. लागत के लिए कारण है कि दुनिया की ‘केंद्रीय डोमेन-नेम पुस्तिका’ को अद्यतन (अपडेट) की जरूरत होती है और किसी को उस के लिए भुगतान तो करना ही होगा. आपने गौर किया होगा कि मैनें पिछले वाक्य में जानकारी का एक और् टुकड़ा ‘डोमेन-नेम पुस्तिका’ (web address book of domains) के रुप में जोड़ा है, तो अब इस के बारे में बताना भी जरुरी हो जाता हैः एक वेबसाइट के डोमेन नाम को जब आप टाइप करते हैं या एक लिंक पर क्लिक करते हैं जोकि आप को उस डोमेन पर ले जाता है, इस समय आपके ब्राउज़र डोमेन-सर्वर से पूछते हैं कि वह विशेष डोमेन-नेम किस वेब-सर्वर पर बैठा है और तब डोमेन-सर्वर ब्राउज़र को, विशाल डोमेन-नेम-पुस्तिका से पढ़ कर बताता है कि कहाँ जाना है.

मैं बहुत जल्दी ही इस विषय का भाग-2 प्रकाशित करूंगा…

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हम भारतीय

नीरज बाली द्वारा Jul.02, 2009 को, मेरी कविता श्रेणी के अंतर्गत

हम भारतीय!
स्वयं कुछ नहीं करते
दूसरों को पुकारते रहते हैं
हम! गिरते हैं, उठते नहीं
परन्तु और पसारते रहते हैं

सब ढोंग है, प्रवृति का
आलस्य में उलझी आत्मा
विवश है, अकर्मठता पर
स्वार्थ के तोतले शब्द
स्व-स्थापित हो चुके हैं
मानव जिव्हा पर
मूल भाषा बन कर
तभी तो!
हम कभी कहते नहीं
फुंकारते रहते हैं!!

दरिद्र है प्रत्येक जन
जो अज्ञ है आत्मबल का
जो साधक व वादक है
भूत की वीणा का
हम में से कोई भी
रचयिता नहीं
नवीन राग का
क्योंकि हम, रचते नहीं
बस अलापते रहते हैं

मन मगन हैं
अवशेष मधुरता के
कर्कश कूक में कोयल
रूदन करती है
सूखे हुए अम्बुआ से
गहनों से जगमगाती ‘नववधू’
चिन्तित है
पिता की चिता की लकड़ी हेतू
ध्वस्त हो चुके हैं सम्बन्धों के सेतू
शेष बचे हैं
कुछ पथरीले बुलबुले
जो फूट रहे हैं बारी-बारी
हम हो चुके हैं
पूर्ण शिकारी
क्यों?
इसलिए कि हम
सृजनते नहीं
मारते रहते हैं

निवारण्!!
असमर्थ सा जमा पड़ा है
कुछ दूर ठण्ड में
कारण यही कि हम
जलते नहीं मशाल सा
बस अंगारते रहते हैं
और
हम नग्न हैं, पहनते नही
उतारते रहते हैं…

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ब्रह्मांडीय चेतना, मानव और धर्म

नीरज बाली द्वारा Apr.12, 2009 को, धर्म एंव दर्शन श्रेणी के अंतर्गत

ब्रह्मांडीय चेतना प्रत्येक मानव की उद्धारकर्ता है और मानव मस्तिष्क का विकास इसी लौकिक चेतना का ही एक उत्पाद है. ब्रह्मांडीय चेतना के अनुभव की वास्तविक प्रकृति के बारे में तभी जाना जा सकता हैं जब हम एक खुले मस्तिष्क और विनम्रता की भावना के साथ अपनी मानसिक स्थिति का अवलोकन करने का प्रयास करें. प्रत्येक धर्म हमें यही सिखाने का प्रयास करता है.

मेरे विचार और निष्कर्ष अगर सही हैं तो इस समय समाज में स्वंय को समझने से महत्वपूर्ण कोई और विषय नहीं हो सकता जबकि आज का मानव दूसरों को समझने और मारने में ही मगन है. ये कैसी दौड़ है जहाँ जीतने वाला गंतव्य तक अकेला ही पहुंचना चाहता है? मानव मस्तिष्क अभी भी जैविक विकास की स्थिति में है और इस विकास की गति इतनी तेज है कि इसके तूफान ने पूरी सामाजिक और राजनीतिक संरचना को ही तहस-नहस कर दिया है. आज मानव अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिये समाज को विभाजित करता जा रहा है, मुझे तो वह दिन स्मरण करके भय आता है जब समाज में हर व्यक्ति का अपना अलग से धर्म होगा, तब हम जानवरों की तरह अपनी घास खाने में ही व्यस्त रहेंगे और जब ‘शेर’ आयगा तो हम केवल अपनी ही जान बचाने के लिये भागेंगे ना कि एकता के साथ उस का सामना करेंगे.

आज हमें आवश्यकता है अपने-अपने धर्मों को समझते हुए मस्तिष्क के विकास को सकारात्मक पथ पर लाने की, ना कि उस के अधीन हो जाने की. परमात्मा ने मस्तिष्क को जीव-आत्मा के अधीन किया है ना कि जीव-आत्मा को इस स्थूल मस्तिष्क के. दुनिया की स्थिति में निरंतर तनाव और दबाव, एक सामान्य बुद्धि में असंतोष और शांति की कमी, निकट आपदा के कथित पूर्वाभास, औषधियों (ड्रग्स) के व्यापक उपयोग, युवाओं की बगावत, वैवाहिक जीवन की त्रासदियां, राजनीतिक असत्यता और धार्मिक वास्तविकता से दूरी, धर्म से दूर हुए मस्तिष्क के ठोस प्रमाण हैं. मेरे दृष्टिकोण से, धार्मिक अनुभव को हल्के ढंग नहीं लिया जाना चाहिए और धर्म को एक राजनीतिक विषय के रूप में तो कतई भी नहीं लिया जाना चाहिए. धर्म बुद्धि के प्रान्त से परे एक पवित्र विषय है. प्राचीन भारत में सदियों तक विशाल वेदों को स्मृतिबद्ध किया जाता था और मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेषित किया जाता था जो कि एक विलक्षण उपलब्धि थी क्योंकि वहाँ एक अवचेतन जागरूकता थी और मानव जाति के लिए क्या निहित है, इस का अत्यंत महत्व था.

यह स्पष्ट है कि पृथ्वी का मानसिक वातावरण आज वैसा नहीं है जिस रूप में हजारों वर्ष पहले था. लेकिन हमें पता नहीं है कि इस तेजी से बदलाव के पीछे रहस्यमय प्राकृतिक कारक क्या हैं. समस्त पृथ्वी पर बढ़ती पीढ़ियों व पुरानी पीढ़ियों के बीच का अंतर इतना बड़ा और मुश्किल क्यों हो गया है? ये एक अलग विषय है, परन्तु मैं आप को कम शब्दों में समझाने का प्रयास करता हूँ. आप पृथ्वी के वातावरण के बारे में तो जानते ही होंगे, जिस में हम श्वास लेते हैं, परन्तु क्या आपको ज्ञान है कि पृथ्वी का एक मानसिक वातावरण भी होता है, जोकि उस ब्रह्मांडीय चेतना का ही एक अंग है, जिस में हम सोचते हैं? हमारी पृथ्वी एक लोह-चुंबक है इस बात से तो सब सहमत होंगे, आप कृपया ये भी समझ लें कि पृथ्वी की एक अनन्य-आवृत्ति (unique-frequency) भी है और अगर आवृत्ति है तो उसका एक माप भी होगा, जोकि वर्तमान युग में 7Hz आस-पास है. ये भी वैज्ञानिक सत्य है कि मानव मस्तिष्क की भी आवृत्ति होती है. वर्तमान में बहुत से यन्त्र हैं जो मानव मस्तिष्क की आवृत्ति को पढ़ और अंकित कर सकते हैं. मानव मस्तिष्क मे स्थापित न्यूरॉन एक संवेदक (रिसेप्टर) की तरह कार्य करते हैं जोकि सदैव सन्घटित व विघटित होते रह्ते हैं. जिस प्रकार उपग्रह से प्रेषित आवृत्ति संकेतों को हमारे रेडियो या टेलीविज़न ग्रहण कर सकते हैं ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क भी ब्रह्मांडीय आवृत्तियों के प्रति संवेदनशील होता है तथा उन्हें ग्रहण कर सकता है. हमारा मस्तिष्क रेडियो या टेलीविज़न की तुलना में बहुत ही अधिक उन्नत है क्योंकि ये मात्र आवृत्तियों को ग्रहण ही नहीं करता बल्कि स्वयं द्वारा निर्मित आवृत्तियों को ब्रह्मांड में प्रेषित भी करता है. मानव मस्तिष्क भिन्न-भिन्न आवृत्तियों पर कार्य करता है जोकि हमारी भावनात्मक मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है. दैनिक कार्य के समय मस्तिष्क की आवृत्ति 20Hz से 40Hz के बीच होती है और निद्रा के समय 7Hz से 10Hz बीच . मस्तिष्क की आवृत्ति जितनी अधिक होगी हम उतना ही तनाव अनुभव करेंगे और जितनी कम होगी हम उतना ही आनंद व हर्ष अनुभव करेंगे. योग और ध्यान इसी विज्ञान पर आधारित हैं जिस का अनवेषण हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले ही कर लिया था. योग और ध्यान का मूल सिधान्त मानव मस्तिष्क की आवृत्ति को पृथ्वी की प्राकृतिक आवृत्ति के साथ संयोजित करना ही है. उपरोक्त विषय को अगर आप जान पाए हैं तो आप समझ रहे होंगे कि पृथ्वी का मानसिक वातावरण क्या है. जी हाँ, मेरा आशय पृथ्वी या ब्रह्मांड की उस अनन्य-आवृत्ति से है जिस के कारण ही मानव मस्तिष्क में विचार जन्म लेते हैं और विचार से ही इस स्थूल जगत में आकार जन्म लेते हैं. पृथ्वी पर युगों के बदलने से तात्प्रय पृथ्वी की बदलती हुई आवृत्तियों से है और अगर आवृत्तियां बदलेंगी तो पृथ्वी पर सब कुछ बदलेंगा और् मानव इस का अपवाद नहीं हो सकता.

धर्म का सम्बन्ध मनुष्य के अवचेतन से है और कर्म का सम्बन्ध मनुष्य के चेतन से. हमारा अवचेतन सदैव ब्रह्मांडीय चेतना में आसक्त रहता है तभी तो वह चेतन मस्तिष्क के आदेश के बिना ही हमारे हृदय, श्वास, रक्त परिसंचरण व समस्त अंगों के को संचालन में सदैव कार्यरत रहता है. हमारा चेतन मन एक गणना का उपकरण है और तर्क-वितर्क इसका एक तात्विक गुण है यही गुण साधारण मानव को परम तत्व से परे करता है. विशाल वेदों में ऋषियों ने इसी तत्व से मानव का परिचय करवाया है. मनुष्य का वह वर्ग जिस में मौजूदा धर्मों के संस्थापक, रहस्यवादी, भविष्यद्वक्ता सम्मिलित हैं, ने मानवता के व्यवहार पर सबसे बड़ा प्रभाव डाला है. राजाओं, दार्शनिकों, शासकों, वैज्ञानिकों या विद्वानों, सभी ने संयुक्त रूप से एक द्वितीयक भूमिका निभाई है. प्रगट धार्मिक शिक्षण ने एक आकर्षण का आयोजन किया है और मानव मन में एक पकड़ बनाए रखी है जो कि जीवन के किसी भी अन्य क्षेत्र से अतुल्य है. हजारों सालों से ये पकड़ जारी है, क्यों?  क्या है जो लाखों करोड़ों प्राणियों को अपने धर्म संस्थापकों के शब्दों पर आज के इस तर्कसंगत युग में भी विश्वास है? हालांकि शाब्दिक प्रौद्योगिकी के चमत्कारों की बाढ़ में क्यों आज भी जनता को उनके धर्म के आदर्शों में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के तर्कसंगत प्रतिपादन की तुलना में अधिक विश्वास है? क्यों प्रतिष्ठित वैज्ञानिक भी अपने अंत काल में धर्म की ही शरण में जाते हैं? इस विरोधाभास की व्याख्या क्या है? ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां वह तर्कवादी जो युवा काल् में धर्म के प्रति अविश्वासी रहे, अपने जीवन के अन्त काल में धार्मिक दिशा में बदल गये. यहाँ तक कि भौतिकवादी राजनीतिक विचारधाराएं भी जनता के इन विश्वासों को उखाड़ करने में सक्षम नहीं हुईं. इस का मूल कारण यही है कि मनुष्य का चेतन मन तो उस ब्रह्मांडीय चेतना, जिसे ईश्वर, भगवान व चाहे कुछ भी कहें, को नकार सकता है परन्तु उस का अवचेतन मन इस सत्य को कभी नकार नहीं सकता जैसे नदी का जल कभी नकार नहीं सकता कि वह पृथ्वी पर बहता है परन्तु मूर्ख मछली इसे ना माने, पूर्ण संभव है.

मेरे इस लेख का मुख्य उदेश्य आप को उस ब्रह्मांडीय चेतना से अवगत करवाना है जो प्रत्येक क्षण हमारे चारों ओर प्रवाहित रहती है, जो जीव के माध्यम से हमें परिवर्तनशील रहने के लिए बताती है और सभी धर्म सिर्फ उसी को जानने का भिन्न-भिन्न पथ हैं जो उसी ब्रह्मांडीय चेतना पर समाप्त होते हैं क्योंकि वहाँ से आगे कुछ नहीं सिवाय अन्नत के.

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